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Ep 2- Ishq aur Purani Delhi

Team Podcastwale October 4, 2019 157 5


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“सुनो कल जलेबी खाने के लिए दरिबे कलां वाली गली मिलना”

“तुम यहाँ फ़ोन मत किया करो, कोई और उठा लेता तो?”

“तो मैं फ़ोन काट देता” “मैं आ जाऊंगी, सलीम को बोलना उस टाइम अब्बू का ध्यान बंटा दे”

“हां, बोल दूँगा, तुम आ जाना” “हां, आ जाऊंगी”

// कल //

“हाथ छोड़ो, किसी ने देख लिया तो”

“प्यार किया तो डरना क्या?”

“ज्यादा फ़िल्मी मत बनो, अब्बू को पता चला ना मैं एक ब्राह्मण से नैन लड़ा रही हूं, तो दंगे हो जाएंगे”

“जाना, इश्क़ में तो मजनूं और रांझा ने भी पत्थर खाये थे, हम दंगे भी झेल लेंगे”

“चलो, अब जाने दो, कल परांठे वाली गली के पीछे मिलना”

// कल //

“भैया, भैया, भैया, बाहर आओ” “क्या हुआ छोटू?”

“भैया, वो जिस दीदी के लिए आप ग़ुलाब और खत भेजते हो हमारे साथ, उनका निक़ाह हो वाला है”

“अबे, क्या बक रहा है”

// कल //

“सलीम भाई, ये क्या हुआ, कब हुआ?”

“भाईजान, चचा ने कल आपी का निकाह तय कर दिया है, उनको आपसे मिलने है”

“उसने कुछ बोला नहीं?”

“भाईजान आप तो जानते हो, आप जल्दी से गली क़ासिम जान के पास आओ”

“सुनो, ये ग़लत हो रहा है, तुम ऐसे नहीं छोड़ के जा सकती”

“तुम समझो, मैं मजबूर हूँ।”

“यही था तुम्हारा इश्क़, यही थे वो वादे”

“शायद मैं तुम्हारी मंज़िल नहीं हूं, तुम कहीं और के मुसाफ़िर हूँ”

“और सुनो, पतंग उड़ान मत भूलना”

//15 साल बाद//

ये एक कहानी थी उन हज़ारों कहानियों में से,
जिनका गवाह ये गलियां है पुरानी दिल्ली की।
मुझे 15 साल लग गए ये समझने में की ग़ालिब भी इसलिए आये थे पुरानी दिल्ली की गलियों में, क्योंकि उन्हें भी ये कहानियां सुननी थी।
मेरे इश्क़ के बारे में कोई नहीं जानता इन गलियों के अलावा,
यही गवाह है उन हसीन लम्हों के,
उन छुपती छुपाती मुलाक़ातों के,
उन प्यार भरी बातों के,
उस मासूम इश्क़ के जो कभी मुक़म्मल ना हो पाया।
आज भी अकेलेपन को साथी बना के,
आ जाता हूं वापस इन गलियों में अपने इश्क़ की अधूरी कहानी सुनने।

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